
दल्लीराजहरा – महिलाओं की उपवास की अनेक परंपरा पूरे भारत वर्ष में मनाया जाता है। किंतु अपने बच्चों की दीर्घायु का पर्व कमरछठ की बात ही कुछ और है जहां महिलाएं अपने संतान के लिए यह उपवास रखकर उनके उज्ज्वल भविष्य , स्वस्थ शरीर , व खुशहाल जीवन की कामना रखकर उपवास रखती है। यह दौर प्रति वर्ष चलता आ रहा है । बात की जा रही इन महिलाओं की जिन्होंने अपने पुत्र की खुशहाली के लिए व्रत रखकर अनेक महिलाएं एक स्थल एकत्रित होकर सगरी बना भैस का दूध दही लाई महुआ बेल पत्ती खमार काशी का फूल व पसेर चावल आदि का उपयोग कर उपवास तोड़ते है। इस दरम्यान पुस्तक के माध्यम से कमरछठ की कथा सुनाते वक्त कहा गया की हल षष्टी में उपासना दौरान पारण करने से पहले कुत्ता बिल्ली कौआ भैस ब्राम्हण बालक इन छहो के लिए हिस्सा भी निकालना चाहिए। सूर्यास्त के पहले व्रत का पारण करके घर की पूर्ण रूप से साफ सफाई कर लेनी चाहिए। हलषष्टि के व्रत को कही कही कमरछठ का व्रत अथवा छठ महारानी का व्रत भी कहा जाता है। ऐसी कथा नगर के वार्ड क्रमांक 21 पंचपिपलेश्वर मंदिर में आयोजित पूजा कार्यक्रम के दौरान उपवास रत महिलाओं ने कहकर इस पारंपरिक कमरछठ का मान रखा गया। व अपने बच्चों की सुख समृद्धि की कामना की गई । इस अवसर पर वार्ड की शशी श्रीवास,कुमारी श्रीवास, नेहा श्रीवास, ममता डहरवाल,पुष्पा यादव, निर्मला श्रीवास, कविता श्रीवास, भावना राव,राजकुमारी श्रीवास, रागिनी जोगदंड, महिलाएं अपने पुत्र की दीर्घायु की कामना उपवास रख कर की गई।
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