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अक्ती(अक्षय तृतीया)छत्तीसगढ़ी संस्कृति की विशेषता से जुड़ा अनोखा पर्व :- झम्मन लाल हिरवानी

cg24 आजतक न्यूज

गुरुर/बालोद-छत्तीसगढ़िया क्रान्ति सेना ब्लाक संयोजक झम्मन लाल हिरवानी ने छत्तीसगढ की पारम्परीक त्यौहार की सुभ अवसर क्षेत्र वासीयों की सुभ ,शान्ति वा समृध्दि की कामना करते हुये कहा कि, यह पर्व गुड्डे-गुड़ियों की शादी का अनोखा पर्व है। अक्ती अक्षय तृतीया अर्थात अक्ती के दिन गांव-गाव में ही नहीं, भिन्न-भिन्न समाजों के लोगो इस संसकृति के अनुरुप आदर्श विवाह करने की धूम रहती है। अक्ती पर्व छत्तीसगढ़ में पुराने और नए के बीच का सेतु है। वह सदा पुराने से नए, प्राचीन से अर्वाचीन, जड़ता से गतिशीलता की ओर चलता चला आया है। यही इसकी विशेषता है। ‘अक्ती’ छत्तीसगढ़ विशेषता से जुड़ा अनोखा पर्व है। छत्तीसगढ़ में पर्वों और कुछ विशेष तिथियों के यह अक्ती पावन पर्व अक्षय तृतीया है
छत्तीसगढ़ में रामकथा, महाभारत, भर्तृहरि गाथा, ढोला मारू, लोरि, कायन कर्मा सुवा,छत्तीसगढ़ी रंग में रंग कर विशिष्ट अंदाज में पीढ़ी दर पीढ़ी प्रचलन की समृद्ध परंपरा के दम पर जन-मन और कण-कण में परिव्याप्त है। छत्तीसगढ़ दुनिया भर की श्रेष्ठ परंपराओं को अपने ही ढंग से ग्रहण करता है। भाषा, व्यवहार, आचरण संस्कार,और परंपरा का छत्तीसगढ़ी अंदाज कराता है। हिरवानी के यह भी कहा कि, इसी दिन साल भर के लिए किसान अपने खेती,किसानी कार्य के लिये समर्पित हो जाते है । गाँव के समस्त डिही डोगर, देवी-देवताओं की सेवा करने वाला पुजारी बैगा,अक्ती के दिन बैगा गांव पर सदैव कृपा बनाए रखने के लिए देवी से प्रार्थना करता है।
छत्तीसगढ़ में आज भी अक्ती के दिन अधिकतर शादियां सादिगीपूर्ण छत्तीसगढ़ी संसकृतियां से होती हैं।इस संसकृति की सराहना कर छत्तीसगढ़ मे भी विभिन्न समुदाय के लोग आज यह संसकृति से विवाह कर रहे है। छत्तीसगढ़ में भिन्न-भिन्न पर्वों का अपना ही महत्व है। आशा और विश्वास बढ़ाने वाले पर्वों में अक्ती विशेष है।
छत्तीसगढ़िया क्रान्ति सेना के पदाधिकारी देवेन्द्र साहू,शशी भूषण चंद्राकर,सुभाष साहू कहा कि-अक्षय तृतीया अर्थात अक्ती के दिन बच्चे अपने मिट्टी से बने गुड्डे- गुड़ियों अर्थात पुतरा-पुतरी का ब्याह रचाते हैं। कल जिन बच्चों को ब्याह कर जीवन में प्रवेश करना है, वे परंपरा को इसी तरह आत्मसात करते हैं। बच्चे, बुजुर्ग बनकर पूरी तन्मयता के साथ अपनी मिट्टी से बने बच्चों का ब्याह रचाते हैं। इसी तरह वे बड़े हो जाते है और अपनी शादी के दिन बचपन की यादों को संजोए हुए अक्ती के दिन मंडप में बैठते है। अक्ती के दिन महामुहूर्त होता है। बिना पोथी-पतरा देखे इस दिन शादियां होती हैं।यही कारण छत्तीसगढ़ की संसकृति और पर्व महान है

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