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डौंडीलोहारा :- ग्राम कामता में चल रहे श्रीमद्भागवत कथा पुराण के तीसरे दिवस ध्रुव चरित्र व जड़ भरत कथा का मर्म स्पर्शी व्याख्यान व्यास पीठ से पंडित कृपा शंकर मिश्र उपाध्यायपुर उत्तर प्रदेश ने करते हुए श्रोताओं को बताया कि उत्तानपाद की सुनीति पहली पत्नी थी। जिसका पुत्र ध्रुव था सुनीति बड़ी रानी थी लेकिन राजा सुनीति के बजाय सुरुचि और उसके पुत्र को ज्यादा प्रेम करता था। तभी वहां सुरुचि आ गई अपनी शौतन के पुत्र ध्रुव को गोद में बैठा देखकर उसके मन में जलन होने लगी तब उसने ध्रुव को गोद में से उतारकर अपने पुत्र को गोद में बैठाते हुए कहा राजा की गोद में वही बालक बैठ सकता है और राज सिहासन का भी अधिकारी हो सकता है जो मेरे गर्भ से जन्मा हो। तू मेरे गर्भ से नहीं जन्मा है , यदि तेरी इच्छा राजसिंहासन प्राप्त करने की है तो भगवान नारायण का भजन कर उनकी कृपा से जब तू मेरे गर्भ से उत्पन्न होगा तभी सिहासन प्राप्त कर पाएगा। 5 साल का अबोध बालक ध्रुव सहम कर रोते हुए अपनी मां सुनीति के पास गया और उसने अपनी मां से उसके साथ हुए व्यवहार के बारे में बताया। मां ने कहा बेटा सुरुचि तेरी सौतेली मां है तेरे पिता उससे अधिक प्रेम करते हैं इसी कारण वह हम दोनों से दूर हो गए हैं। अब हमें कोई सहारा नहीं रह गया है। हमारे सहारा तो जगतपति नारायण ही है । नारायण के अतिरिक्त अब हमारे दुख को दूर करने वाला कोई दूसरा बचा नहीं है। इस बात को सुनकर बालक ध्रुव ने भगवान नारायण की तपस्या करने जंगल की ओर रवाना हो गए।बालक ध्रुव जो भगवान विष्णु का परम भक्त था 5 साल के बालक ध्रुव के मन पर दोनों ही मां सुनीति व सुरुचि के व्यवहार का बहुत गहरा असर हुआ। और वह एक दिन घर छोड़कर चला गया।रास्ते में उसे नारद जी मिले नारद मुनि ने उससे कहा बेटा तुम घर जाओ तुम्हारे माता-पिता चिंता करते होंगे। लेकिन बालक ध्रुव नहीं माना और कहा कि मैं नारायण की भक्ति करने जा रहा हूं तब नारद मुनि ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र की दीक्षा दी । वह बालक यमुना नदी के तट पर मधुबन में इस मंत्र का जाप करने लगा। फिर नारद मुनि ने उसके पिता उत्तानपाद के पास गए तो उत्तानपाद ने कहा कि मैंने एक स्त्री के वश में आकर अपने बालक को घर छोड़कर जाने दिया। मुझे इसका बहुत दुख है । फिर नारद जी ने कहा कि अब आप उस बालक की चिंता ना करें। उसका रखवाला तो अब भगवान नारायण स्वयं हैं। भविष्य में उसकी कीर्ति चारों ओर फैलेगी। उधर बालक की कठोर तपस्या से अत्यंत ही अल्पकाल में भगवान नारायण प्रसन्न हो गए और उन्होंने दर्शन देकर कहा हे बालक मैं तेरे अंतर्मन की व्यथा और इच्छा को जानता हूं तेरी सभी इच्छाएं पूर्ण होगी। भक्त ध्रुव को परम् पद की प्राप्ति हुई जिसका चरित्र तीनो लोक में विख्यात है। इसलिए प्रभु भक्ति में लीन हो जाना चाहिए।परीक्षित के भूमिका में उत्तम सिन्हा व निर्मला सिन्हा विराजमान थे। प्रतिदिन ग्रामीणों के अलावा क्षेत्र वासी का आगमन भागवत कथा का रस पान करने हो रहा है। भागवताचार्य पंडित कृपा शंकर मिश्र ने कथा का सारांश बताते हुए कहा कि मानव जीवन का कल्याण सिर्फ भगवत भक्ति से संभव है। जो नारायण की भक्ति करता है उसे परम पद की प्राप्ति होती है। अन्तर्मन में आंनद की अनुभूति होती है। जिसे लोग दर दर भटक कर ढूंढते हैं। सभी ईश्वर आराधना कर आनन्द की अनुभूति करें।
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