
सूर्यग्रहण के संबंध में सदियों से प्रचलित अंधविश्वास व मान्यताएँ –
सूर्य या चंद्रमा को राहू या केतु नामक दुष्ट राक्षस के निगल जाने से ग्रहण होता है।
ग्रहण के दौरान खाना पकाना या खाना पीना नही चाहिए। बचे हुए भोजन को फेंक देना चाहिये।
गर्भवती महिला को बाहर नही निकलना चाहिए।
यात्रा अशुभ होता है।
बीमारी या सक्रमण फैलता है।

अंचल के खगोलशास्त्री बी एन योगी के अनुसार ऐसे किसी भी प्रकार के अंधविश्वासों को मानने के बजाए उसके पीछे के कारणों को समझने का प्रयास करना चाहिए पुराने दिनों में अज्ञानता और अशिक्षा के कारण ऐसी मान्यताएं प्रचलित थी जब एकाएक दिन में शाम होने जैसा अंधेरा छा जाए तो उसे दैवीय प्रकोप या अनहोनी से जोड़कर देखा जाता था। लेकिन विज्ञान के उन्नति के साथ सबको पता है कि
सूर्य तथा पृथ्वी के बीच चंद्रमा आ जाने के कारण सूर्यग्रहण होता है। अपनी-अपनी कक्षाओं में परिक्रमा करते हुए चंद्रमा या पृथ्वी में से कोई एक जब सूर्य के सामने आ जाता है तो सूर्य का प्रकाश अंशत: या पूर्णत: दूसरे तक नहीं पहुँच पाता तो ग्रहण लगता है। सूर्यग्रहण सदैव अमावश्या के दिन ही होता है।

ग्रहण का वैज्ञानिक महत्व –
पूर्ण सूर्यग्रहण के समय ही 18 अगस्त 1968 को पियरे जानसन और नारमन लाकयर ने हिलियम गैस की खोज की थी।
आइंस्टीन के अनुसार गुरुत्वाकर्षण के कारण तारों का प्रकाश मुड़ जाता है, इसकी पुष्टि पूर्ण सूर्यग्रहण के दौरान ही हुआ।
ग्रहण के समय चांद या पृथ्वी की छाया गोलाकार होता है, जिससे इनके गोल होने की पुष्टि होती है।
आज अटल लैब के वेधशाला में जिज्ञासु और वैज्ञानिक सोच रखने वाले छात्र छात्राएं शिक्षक और पालक उपस्थित होकर खगोलीय घटना का 10 इंच व्यास वाले परावर्तक टेलीस्कोप से ठीक 4 बजकर 52 मिनट पर चंद्रमा जैसे ही सूरज को स्पर्श किया तब से लेकर सूर्यास्त 5.30 तक सूर्यग्रहण का अवलोकन किया।
इस अवसर टेलीस्कोप से बी एन योगी ने सौर धब्बे को भी दिखाया। इसके अवलोकन के लिए अखिलेश वर्मा, सुनील गुप्ता, कादम्बिनी यादव बड़गांव से, नेहा साहू गुजरा से, सूर्यकांत साहू सोरर से, रानू और तृप्ति योगी चारामा से, आयुष, ऋषिका, तनिषा, मान्या, जान्हवी, भूमिका, मीनाक्षी, , भास्कर दुधली से, डॉली सहित अनेक पालकगण उपस्थित थे।

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