

बालोद – बालोद जिले के डौंडीलोहारा ब्लॉक के धार्मिक तीर्थ स्थल जामडी पाटेश्वर धाम को लेकर ग्राम तुयेगोंदी के ग्रामीणों सहित सर्व आदिवासी समाज के लोगों के द्वारा फिर से इस मामले को लेकर जिला कलेक्ट्रेट घेराव व आंदोलन करने से फिर एक बार जिले के साथ साथ डौंडीलोहारा क्षेत्र की राजनीतिक मौसम में और गर्माहट बढ़ गया हैं।
जामडी पाटेश्वर धाम को लेकर संत राम बालकदास के साथ तुयेगोंदी के ग्रामवासी व आदिवासी समाज के बीच लंबे समय से कुछ विषयों को लेकर टकराहट बना हुआ है। जो समय समय पर आंदोलन, घेराव व विवाद के रूप में सामने आते रहता है।
आदिवासी समाज के लोगों का कहना है कि रिजर्व वन भूमि पर ग्रामसभा व ग्रामीणों की बिना सहमति से पाटेश्वर धाम संस्थान के द्वारा लगातार जंगलों की कटाई कर धीरे धीरे मंदिर के अंदर कई तरह के निर्माण कार्य कराए जा रहे हैं। व जमीन का अधिग्रहण किया जा रहा है। जो सही नहीं है। सर्व आदिवासी समाज के नेताओं का इस मंदिर व आयोजनों को लेकर लंबे समय से विरोध चले आ रहा है। वे इसे आदिवासी पूजा पद्धति,मान्यताओं व रूढ़ि वादी परंपराओं पर रोक का कारण मानते हैं। उनका कहना है कि जामडी पाटेश्वर धाम में जो मंदिर व अन्य कार्य किए जा रहे हैं। वो गलत है। वह भूमि तूएगोंदी गांव के अंतर्गत आता है। और यह आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है जिसके ऊपर पहाड़ी पर आदिवासी समाज का देवस्थल विराजित है। जिसे वो पाट देवता के रूप में वर्षों से पूजते चले आ रहे हैं। जिसपर भी आरोप प्रत्यारोप पूजा पद्धति को लेकर होते रहा है।

आदिवासी समाज परंपरा अनुसार बलि पूजा को मानने वाले हैं। वही कुछ वर्ष पूर्व इसी बात को लेकर एक बड़े विवाद ने जन्म लिया था जिससे पूरा बालोद जिला प्रभावित हुआ था। छत्तीसगढ़ क्रांति सेना,सर्व आदिवासी समाज के बैनर तले बड़ा आंदोलन इस मामले पर हुआ था। जिससे उपजे वर्ग संघर्ष का विवाद आज भी कोर्ट में जारी है।
विवादों से अलग पाटेश्वर धाम हिंदुओं की श्रद्धा व आस्था के प्रमुख केंद्र बिंदु बन गया है। जहा निर्माणाधीन पंचमुखी हनुमान मंदिर,माता कौशल्या का मंदिर,अखंड धूनी,सीता रसोई, यज्ञ स्थल,गौशाला को देखने हजारों लोग आते रहते हैं। इस जगह वर्ष भर कुछ न कुछ धार्मिक आयोजन होते रहता है। जिससे यह स्थान हिंदू धर्म से जुड़ा एक बड़े केंद्र के रूप में विकसित हो रहा है।
विकास के लिए सरकार ने करोड़ो रुपए के कार्य कराए – धार्मिक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित हो रहे इस मंदिर को भव्य स्वरूप देने के लिए छत्तीसगढ़ सरकार के द्वारा कई विकास के कार्य कराए गए वही कुछ चल रहे हैं।

लेकिन आदिवासी समाज संगठन के विरोध की आवाज के बीच में पाटेश्वर धाम लगातार विवाद के लिए सुर्खियों में बने रहता है। जिससे शांत वन्य क्षेत्र में अशांति का वातावरण बनता है। वर्ग संघर्ष की स्थिति पैदा होता है।
हाल ही में आदिवासियों ने जिस तरह से जिला कलेक्ट्रेट का घेराव किया प्रदर्शन किया व पाटेश्वर धाम का विरोध किया इससे आने वाले समय में पुनः एक बार बड़े आंदोलन की आहट सुनाई दे रहा है। जो किसी भी तरह से सही नहीं होगा। जिला प्रशासन को चाहिए कि वो इस विवाद के उठते विषय को जल्द से जल्द हल करे व दोनों पक्षों को बैठाकर समाधान निकाले
मुख्य विवाद वन भूमि – यह बात तो स्पष्ट है कि मंदिर व अन्य सुविधाओं का निर्माण वन्य भूमि में हो रहा है। लेकिन यह आज नहीं बन रहा स्व. बड़े संत राम जानकीदास जी वर्ष 1975 से यहां जंगलों में निवास कर पूजा ध्यान करते रहे हैं । जो अनवरत आज भी जारी है। फर्क इतना की पहले मंदिरों के आकार छोटे थे आज समाज के सहयोग से भव्य मंदिर का निर्माण हो रहा। राज्य सरकार के द्वारा भी नए कार्य स्वीकृत किए गए हैं।
समय समय पर आयोजनों में कई मुख्यमंत्रियों,मंत्रियों,सांसदों,विधायकों सहित वर्तमान शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद जी महाराज,राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सर संघचालक श्री मोहन भागवत व अन्य दिव्य संतो का आगमन हुआ है। इसलिए यह पाटेश्वर धाम क्षेत्रीय धार्मिक स्थल नहीं अपितु राष्ट्रीय स्तर पर पहचान पाने वाला धार्मिक स्थान बन गया है।
सरकार ही कार्य स्वीकृत करें,जिला प्रशासन के विभाग कार्य संपादित करें फिर समाज के आंदोलनों के बाद निर्माण पर रोक यह बात लोगो को पसंद नहीं। इससे क्षेत्र स्तर पर असमंजस की स्थिति बन रहा है।
आदिवासी समाज व सनातन धर्म को मानने वालों को इस मुद्दे का हल निकालना ही चाहिए। व पूरे मामले को समाप्त किया जाना चाहिए।
पाटेश्वर धाम मामले की आड़ में राजनीति करने वालों से जिला प्रशासन, आदिवासी समाज व पाटेश्वर सेवा संस्थान समिति वालों को दूर रखना होगा।ताकि अच्छे विचारों के आदान प्रदान व चर्चा से यह विवाद का हल निकले इसमें जिला प्रशासन की बड़ी भूमिका माना जा रहा है।
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