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पलारी की हार,एल्डरमैन नियुक्ति पर बवाल,जिले में कम नहीं हो रहीं भाजपा की मुश्किलें


बालोद– जिले की राजनीति में भले ही बाहर से सब कुछ सामान्य दिखाई देता हो, लेकिन राजनीतिक हलकों में चल रही चर्चाएं और नेताओं-कार्यकर्ताओं के बयान कुछ और ही तस्वीर पेश कर रहे हैं। खासकर सत्तारूढ़ भाजपा के भीतर असंतोष और खींचतान की चर्चाएं लगातार तेज होती जा रही हैं।

बालोद जिले के 2 पालिका व 6 नगर पंचायतों के लिए कुल 29 लोगों की जारी एल्डरमैन की सूची में जिले की मात्र 3 महिलाओं को ही मौका मिला है। जिससे अंदरखाने महिला कार्यकर्ताओं में भारी असंतोष बना हुआ है।


प्रदेश में सरकार बनने के बाद भाजपा को नगर निगम, नगर पालिका, नगर पंचायत और पंचायत चुनावों में कई स्थानों पर सफलता मिली। और इसके चलते कई नेताओं को श्रेय भी मिला लेकिन समय बीतने के साथ साथ चुनावी हार से बालोद जिले में भाजपा संगठन के भीतर असंतोष के स्वर खुलकर सामने आने लगे हैं।
हाल ही में संपन्न पलारी नगर पंचायत चुनाव में मिली हार के बाद पार्टी की रणनीति, कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। वहीं अब कुछ दिन पहले निकायों के लिए जारी एल्डरमैन नियुक्ति सूची ने भी नया विवाद खड़ा कर दिया है। विशेषकर दल्ली राजहरा नगर पालिका में सूची को लेकर नाराजगी सामने आई है। चर्चा है कि सूची में महिला प्रतिनिधियों को स्थान नहीं मिलने से कई महिला कार्यकर्ताओं में असंतोष है और इस मुद्दे पर बयानबाजी भी देखने को मिल रही है।
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि संगठनात्मक कार्यक्रमों में एकजुटता जरूर दिखाई देता है, लेकिन दूसरी तरफ सोशल मीडिया, सार्वजनिक बयानों और स्थानीय चर्चाओं में कार्यकर्ताओं की नाराजगी झलक रहा है। जिले के कुछ नेताओं और कार्यकर्ताओं द्वारा कार्यप्रणाली, चाटुकारिता तथा महिलाओं की उपेक्षा जैसे मुद्दे भी उठाए जा रहे हैं।
बालोद जिले में भाजपा पिछले तीन विधानसभा चुनावों में लगातार अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर सकी है। टिकट वितरण में कई प्रयोग किए गए, लेकिन चुनावी परिणाम पार्टी के पक्ष में नहीं रहे। ऐसे में लगातार हार के कारणों पर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा बनी हुई है।
जिले में प्रदेश स्तर के कई बड़े नेताओं की मौजूदगी के बावजूद चुनावी लाभ नहीं मिल पाने को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। इन दिनों नेताओं के सोशल मीडिया पोस्ट, स्टेटस और सार्वजनिक संदेश भी चर्चा का विषय बने हुए हैं। इन्हें लेकर तरह-तरह के राजनीतिक मायने निकाले जा रहे हैं।

राजनीति में चर्चा व बयान चलते रहता है कि बालोद जिले की राजनीति दिल्ली से कम नहीं यहां पार्टी के अंदर कई चेहरे राष्ट्रीय स्तर के है व पहुंच पहचान भी काफी बड़ा है। वहीं वर्तमान में प्रदेश महामंत्री, प्रवक्ता, प्रदेश कार्यसमिति सदस्य जैसे बड़े ओहदों में बैठे नेताओं का भी बड़ा बोलबाला है। बावजूद आमजनता में इसका फायदा क्यों नहीं हो रहा ? आखिर चुनावों में जाते ही ऐसे नेताओं की मौजूदगी के बाद पार्टी को चुनावों में फायदा क्यों नहीं होता आखिर उम्मीदवार क्यों हार जाते हैं। यह गौर करने की बात है।


फिलहाल माना जा रहा है कि यदि आगामी चुनावों से पहले भाजपा संगठन कार्यकर्ताओं की नाराजगी दूर करने और मनोबल मजबूत करने में सफल होता है, तो राजनीतिक स्थिति बदल सकता है। हालांकि वर्तमान हालात को देखते हुए यह चुनौती आसान नहीं माना जा रहा है।

जानकारों की माने तो जिले में संगठन के अंदर चल रहे घटनाक्रम अब जिले के अंदर न रहकर राजधानी तक व बड़े नेताओं तक पहुंच रहा है मतलब साफ है। की जिला भाजपा में सब कुछ वैसा नहीं चल रहा जैसा दिख रहा है।


(यह राजनीतिक विश्लेषण स्थानीय स्तर पर चल रही चर्चाओं, सार्वजनिक बयानों और राजनीतिक घटनाक्रमों पर आधारित है।)

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