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कामता में महाशिवरात्रि पर्व पर 108 गीली मिट्टी का शिव लिंग बनाकर 108 जोड़ी यजमानों ने सपत्नीक विराजमान होकर रूद्र महाभिषेक किया गया

Cg24 आजतक

डौंडीलोहारा :- कामता में श्रीमद्भागवत ज्ञान यज्ञ के छठवे दिन कथा व्यास पंडित राजेश तिवारी ने कथा के दौरान बताया कि भगवान दिव्य द्वारिकापुरी में राज कर रहे है और माता रूखमणी आकर भगवान से कहती है कि प्रभु चारो आश्रमो में सबसे धन्य आश्रम गृहस्थ आश्रम को हमारे शास्त्रों में बताया गया है क्योकि इस आश्रम से ही समस्त विश्व में प्राणी जन्म लेकर आपके माया के अनुसार कृत्य करता है इसी से साधु , महात्मा ,ऋषि मुनि इत्यादि से लेकर स्वयं भगवान को भी अवतार लेने के लिए गृहस्थ आश्रम की आवश्यकता है परंतु प्रभु हमारा कोई पुत्र नही है भगवान समझ गए कि माता रुख्मनी के मन मे क्या चल रहा है प्रभु ने कहा देवी अगर हमें पुत्र चाहिए तो भगवान भोलेनाथ जी से प्रार्थना करना होगा भगवान विश्वनाथ जी के प्रसाद से प्रभु के घर कामदेव जी का प्राकट्य हुआ जब उनका नामकरण संस्कार किये तो उनका नाम प्रद्युम्न रखा गया और भगवान के इस पुत्र के द्वारा दानवराज संभरासुर को मोक्ष की प्राप्ति हुई महाराज श्री ने आगे बताया कि एक बार भगवान को चंद्रायन दोष लगा और उस दोष के लगने से प्रभु के ऊपर श्यामन्तक मणि के चोरी का कलंक लगा भगवान के ऊपर ये कलंक इस वजह से लगा कि ये गणेश चतुर्थी के दिन चंद्रदर्शन किये थे शास्त्रो के अनुसार इस दिन चंद्रदर्शन नही करना चाहिए फिर भगवान ने दिव्य लीला करते हुए जाम्बवती , सत्यभामा , कालिंदी आदि 16108 कन्याओ के साथ विवाह किये। भगवान के पूरे परिवार बेटे ,नाती, पोते को मिलाकर 56 करोड़ यदुवंशी हुए एक बार भगवान को धर्मराज युधिष्ठिर के इंद्रप्रस्थ आने का न्योता दिया भगवान जब वहाँ पहुचे तो उनकी दिव्य रूप से स्वागत हुआ भगवान ने धर्मराज युधिष्ठिर से पूछा कि धर्मराज क्यो बुलाए हो तो धर्मराज बोले कि प्रभु राजसूय यज्ञ करने की इच्छा है भगवान बोले राजन अगर मनुष्य के मन मे धर्म के लिए कोई इच्छा होती है तो उसे तुरंत कर लेना चाहिए परंतु आपके इस यज्ञ में राजा जरासंध बाधा है और धर्म मे कोई बाधा हो तो उसे नष्ट कर देना चाहिए भगवान ने भीम के द्वारा जरासंध को मोक्ष प्रदान किये और राजसूय यज्ञ प्रारम्भ हुआ प्रभु ने सबको कार्य बाट दिए धर्मराज युधिष्ठिर और द्रोपदी मुख्य यजमान भीम भैया भंडारे की व्यवस्था में अर्जुन पूजन सामग्री की व्यवस्था में और स्वयं भगवान ब्राह्मणों के जूठे पत्तल उठाने के कार्य मे लगे । शास्त्रो में लिखा है कि अगर संत महात्मा ब्राह्मण आदि के जूठे पत्तल को कोई उठाता है तो उसे सहस्त्र राजसुययज्ञ का पुण्य मिलता है भगवान के नेतृत्व में दिव्य यज्ञ सम्पूर्ण हुआ और फिर भगवान द्वारिका आ गये । अगर भगवान किसी को देते है तो अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते है। उनके एक मित्र थे ब्राह्मण सुदामा जो अत्यंत गरीब थे परंतु धन से लेकिन जिसके पास प्रभु के नाम रूपी रत्न हो वह व्यक्ति कुबेर से भी बड़ा धनपति है सुदामा भिक्षा मांगकर अपने और अपने परिवार का देख रेख करते थे। एक दिन उनकी पत्नी सुशीला से उनसे कहा कि स्वामी आप बताते है कि भगवान द्वारिकधीर आपके मित्र है तो अभी उनके पास गए है उनसे मिले है ब्राह्मण बोले देवी मैं कैसे उनके पास जाऊ वो कहाँ द्वारिकाधीस और मैं एक निर्धन ब्राह्मण अगर कोई व्यक्ति इसी मित्र या परिवार में किसी से मिलने जाता है तो कुछ उपहार लेकर जाता है लेकिन हम इतने गरीब हैं कि दो घड़ी का भोजन भी हमे पेट भर प्राप्त नही होता है। सुशीला के बहुत समझने पर बेमन गये और अपने बगल में एक चावल की पोटली लेकर द्वारिका पहुचे जब प्रभु को पता चला कि उनके मित्र उनसे मिलने आये है तो वो इतने प्रसन्न हुए की न पैरो में खड़ाऊ पहने न सिर में मुकुट और दौड़े दौड़े जाकर भगवान ने अपने मित्र को गले से लगाया और दिव्य द्वारिका में डुबकी सेवा हुई भगवान ने पूछा कि मित्र मेरे लिए कुछ लाये हो सुदामा कुछ नही बोले और भगवान ने उनके बगल में दबी पोटली को छीन कर चावल खाने लगे प्रभु ने दो मुठ्ठी चावल में सुदामा को अपनी समस्त संपत्ति का मालिक बना दिया हमारे प्रभु इतने दयालु है कि दो मुठ्ठी चावल में अपना सर्वस्व अपने मित्र को समर्पित कर दी । महाशिवरात्रि पर्व पर 108 गीली मिट्टी का शिव लिंग बनाकर 108 जोड़ी यजमानों ने सपत्नीक विराजमान होकर रूद्र महाभिषेक किया गया। जिसमें तीन ब्राह्मणों ने धाराप्रवाह मन्त्रों का उच्चारण करते हुए हुए रूद्र महाभिषेक कराया जो कि आकर्षण का केंद्र रहा।

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