
बालोद / माता पार्वती एवं माता सीता ने कठिन तपस्या की तब सीता को राम एवं पार्वती को शंकर भगवान की प्राप्ति हुई। सभी लोग भगवान के घर जाते हैं लेकिन भक्त तपस्या कर भगवान को घर बुलाते हैं। भक्त और भगवान की महिमा अद्वितीय है। उक्त उदगार ग्राम मुजगहन के कौशल्या माता मंदिर में आयोजित संगीतमय श्रीराम कथा के दौरान कनिष्ठ जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी आत्मानंद सरस्वती महाराज ने व्यक्त किए। उन्होंने शिव पार्वती विवाह की कथा सुनाते हुए कहा कि तपस्या की शुरुआत व्रत से होती है। माता सीता और पार्वती ने कठिन व्रत रखकर तपस्या की। व्रत का अर्थ सांसो से तपस्या करना है माता पार्वती ने एक हजार वर्षों तक कठिन व्रत किया। इससे पूरे देवता चिंतित हो गए। बहुत मनाया पर माता नहीं मानी। माता पार्वती ने कहा कि जब तक मुझे शिव नहीं मिल जाती व्रत नहीं तोडूंगी। प्रलय से बचाने के लिए देवताओं ने भगवान शिव को पार्वती से विवाह के लिए मनाया। भक्त व्रत और तपस्या कर भगवान को प्राप्त कर सकता है नयन से राम या फिर काम मिलते हैं। संत भगवान के दूत है। प्रभु के संदेश देते हैं। उन्होंने कहा कि एक दिन सब कुछ यहीं छूट जाएंगे हिसाब तो सांसे थम जाने के बाद होगी। राम कथा में सीताराम में भेद नहीं है। माता पिता और गुरु की वाणी कभी व्यर्थ नहीं होती। चिंता वे करते हैं जिनके पास कुछ होता है और जिनके पास कुछ नहीं वे चिंता नहीं करते। श्री रामकथा पर प्रवचन दे रहे कनिष्ठ जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी आत्मानंद महाराज राष्ट्रीय हिंदू जागरण परिषद के अध्यक्ष तथा श्रीराम जन्मभूमि मंदिर निर्माण न्यास अयोध्या के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं।
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