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चातुर्मास का केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक महत्व भी है- स्वामी आत्मांनंद


श्रीचौमुखनाथ परमधाम आश्रम लखरौली (पथरिया) जिला दमोह मध्यप्रदेश के संस्थापक जगतगुरू कनिष्ठ शंकराचार्य स्वामी आत्मानंद जी सरस्वती का चातुर्मास नर्मदाधाम सुरसली में गुरू पूर्णिमा से जारी है। स्वामी जी 13 जुलाई से 10 सितंबर तक नर्मदाधाम में चातुर्मास करेंगे। इस दौरान प्रतिदिन प्रातः 7ः30 बजे से 9ः30 तक रूद्राभिषेक, महामृत्युंजय यज्ञ प्रातः 10 से 1 बजे तक, कथा प्रवचन दोपहर 3 बजे से शाम 6 बजे तक तथा संध्या आरती प्रतिदिन 7 बजे आयोजित की जा रही है। नर्मदाधाम में प्रतिदिन सैकड़ों अनुयायी उनका कथा प्रवचन सुनने पहुंच रहे हैं। स्वामी जी के सानिध्य में आम नागरिकों का कालसर्प दोष, महामृत्युंजय जाप, शनि दोष, पित्र दोष, ग्रह दोष का निवारण भी किया जा रहा है।
स्वामी जी गौरक्षा, हिंदू जागरण तथा राष्ट्र उत्थान के संकल्प से पुरे देश में भ्रमण करते हैं। इसके पूर्व वे विश्व हिंदू परिषद व अयोध्या के राम मंदिर निर्माण में भी जुड़े रहे। छत्तीसगढ़ के बालोद जिला में स्थित नर्मदा धाम सुरसुली को उन्होने पहली बार अपने प्रवास व चातुर्मास के लिए चयन किया है जहां वे प्रवचन के माध्यम से मानव कल्याण का संदेश दे रहे हैं।
स्वामी जी ने मिडिया से बातचीत के दौरान कहा की जब कोई सन्यासी लगातार दो माह एक आसन और एक जगह रहकर समाज को धर्म का उपदेश देता है तो निश्चित रूप से उस क्षेत्र की जलवायु, वनस्पती उस क्षेत्र का वातावरण धर्ममय हो जाता हैं आज यदि हमारे पास 5 हजार लोग हमारे पास आते हैं तो पांच सौ व्यक्ति ऐसे होंगे उनमें सामाजिक चारित्रिक परिवर्तन शुरू हो जायेगा अगर मेरे कहने से 100 व्यक्ति भी शराब, मांस आदि दुर्व्यसनों से दुर होने हैं तो मेरे एक दिन की साधना सिद्ध हो जाती है, लोगों को समाज के मुख्यधारा से जोड़ने गांव के स्तर में जाकर वर्ष में हम लोग वर्ष में एक बार गरीब और वंचितों को सत्संग का लाभ दिलाने के उद्देश्य से चातुर्मास करते हैं।
चातुर्मास पर प्रकाश डालते हुए उन्होने कहा कि शास्त्रों के अनुसार इस काल में पृथ्वी में रज-तम की वृद्धि के कारण सात्त्विकता बढ़ाने के लिए चातुर्मास में व्रतस्थ रहना चाहिए, चातुर्मास का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी ये चार माह खानपान में अत्यंत सावधानी बरतने के होते हैं। ये चार माह बारिश के होते हैं। इस समय हवा में नमी काफी बढ़ जाती है जिसके कारण बैक्टीरिया कीड़े, जीव जंतु आदि बड़ी संख्या में पनपते हैं। और शरीर की पाचनशक्ति भी कमजोर हो जाती है। इसलिए पूर्णमासी व्रत का पालन करते हुए जीवन बिताना चाहिए।

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