Breaking News
google.com, pub-8616032207403459, DIRECT, f08c47fec0942fa0

संतान की लंबी उम्र के लिए माताओं ने रखें व्रत सगरी बनाकर की पूजा

बालोद cg24आजतक न्यूज़ :- जिला मुख्यालय बालोद सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में माताओ ने अपनी संतान की लंबी आयु के लिए हल सष्टि का व्रत धारण किया आपको बता दें कि
हर साल भादों मास की षष्ठी तिथि को हल षष्ठी व्रत रखा जाता है. इस दिन भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था. इस दिन महिलाएं अपने पुत्र की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं. हलषष्ठी व्रत के 1 दिन पहले ही माताएं बाजारों में जाकर पूजन सामग्री की खरीदारी कर लेती हैं बाजारों से मिट्टी के चुकडी पसहर का चावल सतंजा सहित अन्य पूजन सामग्रियों की खरीदारी करती हैं शुक्रवार को बाजारों में सुबह से लेकर देर शाम तक भीड़ बनी हुई थी
हर साल भाद्रपद मास की षष्ठी तिथि को हलषष्ठी पर्व मनाया जाता है धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस दिन भगवान कृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था. इस पर्व को विभिन्न राज्यों में हलछठ और ललई छठ के नाम से जाना जाता है. महिलाएं इस व्रत को अपने पुत्र की लंबी उम्र और सुख समृद्धि के लिए रखती है. मान्यता है कि इस व्रत को करने से पुत्र पर आने वाले सभी संकट दूर हो जाते हैं
पंडित केशव प्रसाद तिवारी,प्रेम नारायण मिश्रा मोहित दुबे ,ने बताया कि कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि 27 अगस्त के दिन शुक्रवार को शाम 06 बजकर 50 मिनट पर शुरू हो जाएगी और अगले दिन 28 अगस्त को रात 8 बजकर 55 मिनट तक रहेगा. इस दिन सुबह उठकर माताये महुआ के डाल से दातून करेगी एवे डोरी की खली से स्नान करेंगी और व्रत का संकल्प लेंगी इस दिन पूजा – अर्चना करने के बाद निराधर रहगी और शाम के समय में पूजा करने के बाद फलाहार करती हैं. इस व्रत को करने से धन और समृद्धि की प्राप्ति होती है. महिलाएं इस दिन घर के बाहर गोबर से छठी माता का चित्र बनाती हैं. इसके बाद विधि- विधान से भगवान गणेश की पूजा अर्चना करती हैं।



व्रत के दिन छोटे कांटेदार झाड़ी की एक शाखा, पलाश की एक शाखा और नारी जोकि की शाखाओं को एक गमले में लगाकर पूजा -अर्चना करेंगी महिलाएं पलाश के पत्ते पर दूध और सुखे मावे का सेवन कर व्रत का पारण करती है. इस दिन गाय की दूध से बनी दही का सेवन नहीं किया जाता है. इस व्रत को पुत्रवधू महिलाएं करती हैं. शास्त्रों के अनुसार, दिन भर निर्जला व्रत रखने के बाद शाम के समय में पसहर चावल और महुए से पारण करने की मान्यता है. इस व्रत को महिलाएं अपने पुत्र की लंबी उम्र के लिए करती हैं और नवविवाहित महिलाएं पुत्र की कामना के लिए करती है.
धार्मिक कथा के अनुसार, द्वापरयुग में भगवान कृष्ण के जन्म से पहले ही शेषनाग ने बलराम के अवतार में जन्म लिया था. बलराम का मुख्य शस्त्र हल और मूसल है. इसलिए उन्हें हलदर भगवान कहा जाता है
संतान की सुख-समृद्घि की कामना का पर्व हलषष्टी (कमरछठ) श्रद्घा व उत्साह से शनिवार को मनाया गया माताओं ने संतान की लंबी आयु की कामना को लेकर निर्जला व्रत रखा। सगरी बनाकर उसमें जल डालकर पूजा अर्चना कर संतान की दीर्घायु की कामना की। माताओं ने बच्चों की पीठ पर छुई का पोता लगाकर इनकी लंबी उम्र की कामना की
महिलाएं सुबह स्नान-ध्यान कर दोना व टोकनी में पूजन सामग्री लेकर मंदिर वा गांव के चौक में पूजा स्थल व गड्ढा खोदकर सगरी बनाई कुंड के चारों ओर मुरबेरी का पेड़, ताग, पलाटा की शाखा बांधकर हरछठ को गाड़ा तथा भगवान गणेश, शंकर, माता पार्वती की पूजा की पूजा के दौरान पसहर चावल के व्यंजन का भोग लगाया, साथ ही महुआ, चना, भैंस के दूध, दही, घी, जौ, गेहूं, धान मक्का आदि भी अर्पित कर पूजा अर्चना की
बालोद के विभिन्न वार्डों में विवेकानंद , शिकारीपारा , आमापारा गंजपारा आदि वार्डो में व्रतधारी माताओं ने घर के सामने सगरी का निर्माण किया जिसमें नदी, पर्वत का दृश्य भी अंकित था और पीढ़े तथा नंदी की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। पूजा पाठ दोपहर 12 बजे के बाद प्रारंभ हुआ। पूजा के रूप में उपयोग किए जाने वाले नारियल,अगरबत्ती, कुमकुम, बंदन, चंदन, फलाहार के साथ लाई, चना, मूंग, गेहूं, अरहर, दोना पत्तल सहित सात प्रकार के अनाज चढ़ाकर शिव की पूजा की गई पूजा में महुआ बीज, दही, घी रखकर पूजा-अर्चना कर संतान के दीर्घायु और सुख समृद्घि के लिए भगवान से मन्नतें मांगी
शहर के विभिन्न मंदिरों में पूजा पाठ के दौरान पंडितों ने भगवान शिव गणेश की 6 कथाएं सुनाई जिसे व्रतधारी माताओं ने सुना। पूजा-अर्चना के बाद माताओं ने अपने बधाों के पीठ पर सात रंगों के कपड़े के टुकड़ों से निशान लगाकर लंबी उम्र का आशीर्वाद दिय पूजन सामग्री पूजा में समर्पित करने के बाद व्रतधारी माताओं ने पसहर चावल खाकर उपवास तोड़ा तथा भैंसी का दूध और दही व घी का भी उपयोग किया। शहर के साथ-साथ ग्रामीण क्षेत्रों में भी हलषष्ठी पर्व हर्षोल्लास से मनाया गया

 150 से 200 रुपए किलो बिका पसहर चावल

कमरछठ की पूजा में इस्तेमाल किए जाने वाले ‘पसहर चावल’ का महत्व होने के चलते बाजार में चावल की डिमांड बढ़ गई है। आम दिनों में 25-30 रुपए किलो बिकने वाला चावल 150 से 200 रुपए किलो तक बिका।
कमरछठ पर्व को देश के अन्य राज्यों में हलषष्ठी के रूप में जाना जाता है ऐसी मान्यता है इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बड़े भाई बलराम का जन्म हुआ था बलराम का शस्त्र हल होने के कारण पर्व का नाम हलषष्ठी पड़ा इस दिन व्रत रखने वाली महिलाएं हल से जुता हुआ अन्न ग्रहण नहीं करतीं। यही वजह है कि बिना हल जुते अपने आप उगने वाले पसहर चावल को खाने की परंपरा निभाई जाती है साथ ही गाय के दूध-दही की बजाय भैंस का दूध, दही इस्तेमाल किया जाता है। पंडितों की माने तो द्वापर युग में देवकी के छह पुत्रों को कंस ने मार दिया। तब देवर्षि नारद की पे्ररणा से देवकी ने छठ माता का व्रत किया था। एक अन्य कथा के अनुसार अभिमन्यु की पत्नी उत्तरा ने हलषष्ठी का व्रत कियाछठ माता की कृपा से उत्तरा का पुत्र परीक्षित जीवित रहा

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *