14 नवम्बर
पाटेश्वर धाम के संत राम बालक दास जी के द्वारा प्रतिदिन ऑनलाइन सत्संग का आयोजन उनके विभिन्न व्हाट्सएप ग्रुप में प्रातः 10:00 बजे किया जाता है जिसमें सभी भक्त जुड़कर अपनी जिज्ञासाओं का समाधान प्राप्त करते है
आज ठाकुर राम साहू जी ने जिज्ञासा रखि की
बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ।
सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित॥
बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस।
जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु॥
बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहिं कीन्ह जहँ।
संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी॥
कृपया करके इनका भावार्थ बताइए, रामचरितमानस की इन पंक्तियों को स्पष्ट करते हुए बाबा जी ने बताया कि
भवसागर में बहते हुए अनाथ की तरह मनुष्य को पार लगाने वाला कौन है तो यहां पर चार वेदों की वंदना की गई है, जिनको भगवान की महिमा गाते हुए उनका गुणगान करते हुए कभी थकान नहीं आती, ऐसे ही वेदों की वंदना विधाता ब्रह्मा जी की वंदना, जिन्होंने एक ऐसा जहान बना दिया जहाँ संत हैँ तो असंत भी है, जहर है तो अमृत भी है, जहां पर धेनु,है विष भी है तो खल भी है बस उसे प्राप्त करने वाले, समझने वाले नहीं समझने वालों की कमी है
पुरुषोत्तम अग्रवाल जी ने कल की देव उठनी एकादशी के विषय में जानने हेतु जिज्ञासा रखी की,भगवान श्री हरि चार महिने की योगनिद्रा में क्यों जाते हैं। शालीग्राम – तुलसी विवाह क्यों किया जाता है।
देवउठनी एकादशी के महत्व को बताते हुए बाबा जी ने बताया कि यह भगवान बामन के अवतार के समय की कथा है जब राजा बली से वामन जी ने 3 पग जमीन दान में मांगा
बलि ने भगवान वामन के तीसरे पग में अपने मस्तक को भगवान के चरणों के नीचे रख दिया और भगवान ने उसे पाताल लोक पर स्थापित कर दिया तब वामन भगवान ने उनकी इस तीन दान के बदले में एक वरदान मांगने को कहा
राजा बाली ने उन्हें अपनी सुरक्षा के वरदान में बांधकर अपना द्वारपाल बना लिया, और तब से भगवान विष्णु उनके द्वार पर ही पहरा देने लगे
तब रक्षाबंधन के दिन माता लक्ष्मी ने रक्षा सूत्र बांधकर और भाई दूज का तिलक लगाकर राजा बाली से अपने पति को मुक्त करवाया लेकिन भगवान विष्णु ने प्रतिवर्ष 4 माह के लिए राजा बालि के पास रहने का ही निर्णय लिया और इस तरह से
देवशयनी एकादशी से देवउठनी प्रबोधिनी एकादशी तक भगवान विष्णु योग निद्रा में होते हैं, अतः,इन 4 माह में कोई भी शुभ कार्य नहीं किया जाता,
शालिग्राम और तुलसी के विवाह का प्रसंग में, हम जानते हैं कि माता तुलसी जो है वह माता सती वृंदा का ही रूप है, जो कि एक पतिव्रता स्त्री थी जिनका तप भंग होने के कारण उनके पति जालंधर की मृत्यु हो गई, उन्होंने भगवान विष्णु को शालिग्राम रूप में रहने का श्राप दिया और गंडकी नदी से भगवान विष्णु शालिग्राम रूप में प्राप्त हुए, लेकिन माता सती वृंदा को भी इस श्राप से मुक्ति प्राप्त करनी थी अतः उनके सती हो जाने के पश्चात उनकी राख से एक पौधे का जन्म भगवान विष्णु ने किया जो कि तुलसी माता हुई, सती वृंदा भगवान विष्णु के परम भक्त थी और भगवान विष्णु को तिलक मात्र कर देने से ही उनका सतित्व भंग हो गया था उनकी इसी भक्ति और प्रेम भाव को प्रकट करने के लिए प्रबोधिनी एकादशी के दिन तुलसी एवं शालिग्राम जी का विवाह कार्यक्रम किया जाता है तुलसी के नीचे भगवान के शालिग्राम रूप को रखा जाता है सुंदर गन्ने से उनका मंडप आच्छादित किया जाता है सुंदर सुंदर फूलो से उसे सजाया जाता है एवं मंगलाष्टक के साथ विवाह संपन्न किया जाता है और अच्छे-अच्छे पकवान भोजन भी बनाए जाते हैं
इस दिन यथासंभव सबको बुलाकर भोजन भी कराना चाहिए और ब्राह्मणों को भोजन कराया जाए तो अति उत्तम है और दान दक्षिणा प्रदान की जानी चाहिए इस तरह से एकादशी पर्व को उत्साह पूर्वक मनाया जाता है जिसे छोटी दीपावली के रूप में भी कहा जाता है
इस प्रकार आज का ऑनलाइन सत्संग संपन्न हुआ
जय गौ माता जय गोपाल जय सियाराम
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