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जीवों का कल्याण का मुख्य साधन है भागवत कथा – पंडित कृपा शंकर मिश्र

cg24 आज़तक न्यूज

डौंडीलोहारा :- ग्राम कामता में श्रीमद भागवत कथा महा पुराण की अविरल धारा बह रही है। जिसके द्वितीय दिवस मंगलवार को मिस्प्री महाराष्ट्र की भजन मंडली ने भजन कीर्तन करते हुए ग्रामीणों के साथ नाचते गाते भागवताचार्य पंडित कृपा शंकर मिश्र को व्यास मंच पर विराजमान कराया। जहां परीक्षित की भूमिका में उत्तम सिन्हा व निर्मला सिन्हा ने भागवत भगवान व व्यास पूजन कर महाराज परीक्षित की आसन में विराजमान होकर कथा का श्रवण पान किया। कथा व्यास पंडित कृपा शंकर मिश्र उपाध्यायपुर उत्तर प्रदेश ने मंगलाचरण का महत्व बताते हुए कहा कि मंगलाचरण से परम धर्म का निरूपण होता है। मंगलाचरण के माध्यम से मंगलमय देवताओं का आह्वान किया जाता है। जिससे हमारे यज्ञ में किसी प्रकार के विघ्न बाधा नहीं होता है । नकारात्मक ऊर्जा समाप्त होकर सकारात्मक ऊर्जा प्रवेश करती है। सत्कर्म में कोई बाधक न बने इसके लिए मंगलाचरण की आवश्यकता होती है। पंडित कृपा शंकर मिश्र ने श्रीमद भागवत महापुराण रचना की कथा का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार जब देव ऋषि नारद जी ने पृथ्वीलोक को जीव धारियों का उत्तम लोक समझ कर भ्रमण करने के लिये निकले थे। कलयुग के साम्राज्य में जीव धारियो की क्या दशा है? उनके जीवन पर क्या प्रभाव पड़ा है? उनका कल्याण व उद्धार कैसे होगा ? ऐसे सोच कर सभी तीर्थों का भ्रमण करने के पश्चात पाया कि लोग झूठ प्रपंच में लिप्त हैं। जन्म दात्री माता पिता के प्रति आदर का भाव नहीं है। ससुराल पक्ष में कन्या से अधिक लगाव व स्नेह है । चोर उचक्कों का बोलबाला है। उनका ही साम्राज्य है। जीवधारियों के उद्धार के लिये श्रीमद् भागवत कथा ही एक साधन है ऐसा सोचकर भूमण्डल का भ्रमण कर देवर्षि नारद जी ने वेद व्यास जी को जीवों पर कलयुग के प्रभाव को विस्तार से बताया। वेदव्यास जी ने भागवत महापुराण की रचना करने का निर्णय लेकर कथा को लिपिबद्ध करने के लिए पृथ्वी के प्रथम पूज्य देव भगवान गणेश का आह्वान किया । भगवान गणेश आकर वेदव्यास जी के सामने एक शर्त रख दी। जब मैं भागवत महापुराण को लिखना शुरू करूँगा तो मेरे लेखनी रुकनी नहीं चाहिए। विचार कर वेदव्यास जी ने कहा ऐसा ही होगा। परंतु मैं कथा का वर्णन करूंगा लेकिन उनमें कोई गलती ना हो जिसके लिए आप उनका मंथन कर लिपिबद्ध करेंगे। गणेश जी ने स्वीकार कर कथा को लिपिबद्ध करना शुरू किया। वेदव्यास जी को नित्य कर्म से निर्वित्त होना होता था तो कठिन व घुमावदार श्लोक बोल कर चले जाते थे और जल्दी जल्दी नित्य कर्म से निर्वित्त होकर पुनः आसन ग्रहण कर लेते थे। तब तक भगवान गणेश जी सोच समझकर लिखते रहते थे । जब भागवत महापुराण की रचना हो गया तो उसकी प्रचार प्रसार के लिए जीवधारियों तक पहुंचाने के लिए भगवान शंकर को स्मरण किया। भगवान शंकर अपने अंश के साथ पहुंचकर सुखदेव जी महाराज का अवतार धारण कर श्रीमद भागवत महापुराण की प्रचार प्रसार किया।18 पुराणों में श्रीमद भागवत सर्वश्रेष्ठ महापुराण है। जिसमें 18 हजार श्लोक 335 अध्याय व 12 स्कंद समाहित है। मानव को अपने कल्याण के लिए भागवत कथा का रस पान करना चाहिए। भागवत सुनने का शब्द नहीं है बल्कि रसपान करने का है। मानव को सात्विक होकर जीवों पर दया करना चाहिए।

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