
दल्ली राजहरा जैन दादावाड़ी में विराजित परम पूज्य ऋषभ सागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में यह समझाने का प्रयास किया कि यदि कोई हमारा भला करता है तो हमें भला करने वाले के ऊपर ही गुस्सा आता है ,जबकि हमें हमारा भला करने वालों के ऊपर गुस्सा नहीं आना चाहिए बल्कि उनका एहसान मानना चाहिए और यह गुस्सा अपने अंदर अहंकार के कारण आता है।आज मनुष्य में बहुत ज्यादा अहंकार बढ़ गया है जिसकी वजह से हमें अपनी गलती ही नहीं दिखती और अपनी गलती भी हमें सही लगती है,हमें अपने अहंकार को कम करने के लिए स्वयं ही शांत होकर आत्म चिंतन करना होगा और अपने द्वारा की गई गलती का चिंतन कर परमात्मा के सामने बैठकर गलती को स्वीकार करना होगा और गलती का प्रायश्चित करना चाहिए जिससे दोबारा वही भूल ना हो पाए,आज का मानव अपनी गलती को छुपाने के लिए स्वयं की गलती को नहीं बताता दूसरों की गलती को बताता है और जबकि होना यह चाहिए कि हमें अपने द्वारा की गई गलती को स्वीकार कर यह देखना चाहिए कि यह गलती मुझसे कभी प्रमाद के कारण अथवा मेरी जागृति की कमी के कारण हुई और इस प्रमाद अथवा जागृति को दूर कर भविष्य में पुन: गलती ना हो ऐसा प्रयास करना चाहिए। इंसान को सबसे पहले अपने अंदर गलतियों को देखकर उन गलतियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए। जब व्यक्ति में स्वयं सुधार होगा तो परिवार का, समाज का ,और पूरे देश का विकास अपने आप होगा आज का व्यक्ति अपने समान को ज्यादा ध्यान से उपयोग करना है परंतु दूसरों की चीजों को गलत तरीके से इस्तेमाल करता और उपयोग करता है भारतीय संस्कार में अपने से ज्यादा दूसरों की चीजों का ध्यान रखा जाता है यदि हमसे किसी भी प्रकार की गलती हो तो उस गलती का प्रायश्चित जरूर करना चाहिए यदि गलती का प्रायश्चित ना किया जाता है तो यह और बड़ी गलती होती है। आप अपने परिवार के लिए जितना ज्यादा त्याग करने के लिए तैयार होता होते हैं उसे यह जानकारी होती है कि आपके लिए अपका परिवार कितना महत्वपूर्ण है। प्रवचन सभा में गुरुदेव के द्वारा इन सभी बातों का उदाहरण देकर विस्तार से समझाया गया और स्वयं ही आत्म चिंतन कर अपनी गलती को सुधारने हेतु प्रेरित किया गया।व्यक्ति में अपनी गलती को स्वीकार करने का साहस होना चाहिए तभी वह व्यक्ति आगे विकास करेगा और पुन: गलती से बचेगा।
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