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द्रौपदी ने प्रण लिया कि वह अपना अनशन तभी तोड़ेगी जब तक कि अश्वत्थामा के सिर पर लगी मणि उसे नहीं मिल जाती-भगवताचार्य पं. तोरण शर्मा

आयोजन- मार्री बंगला भागवत महापुराण
राजा परीक्षित के जन्म व सुखदेव के आगमन की कथा सुनाई
व्यापारी संघ द्वारा आयोजित भागवत कथा महापुराण के दुसरे दिन सुबह मंगला आरती के पश्चात दोपहर परीक्षित जन्म व वराह अवतार की कथा भगवताचार्य पं. तोरण शर्मा ने सुनाई। उन्होने बताया कि परीक्षित के जन्म की कथा महाभारत के युद्ध के समय की है। जब द्रौपदी को इस बात की जानकारी मिली कि अश्वत्थामा ने उसके पांचों बेटों की हत्या कर दी है तो उसने अनशन करने की ठान ली। द्रौपदी ने प्रण लिया कि वह अपना अनशन तभी तोड़ेगी जब तक कि अश्वत्थामा के सिर पर लगी मणि उसे नहीं मिल जाती। जब अर्जुन को इसकी जानकारी मिली तो वे अश्वत्थामा से युद्ध करने निकल गए। दोनों के बीच भयंकर युद्ध शुरू हो गया। अर्जुन को मौत के घाट उतारने के लिए अश्वत्थामा ने अपना ब्रह्मास्त्र निकाला। यह देख अर्जुन ने भी अपना बचाव करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। तभी वहां नारद और ऋषि व्यास पहुंचे और उन्होंने ब्रह्मास्त्र का इस्तेमाल करने से मना किया। इसके बाद अर्जुन ने अपना ब्रह्मास्त्र वापस कर लिया, लेकिन अश्वत्थामा ने ऐसा नहीं किया।


इसके बाद अर्जुन ने अश्वत्थामा को रस्सी में बांधा और द्रौपदी के पास ले आया। अश्वत्थामा की हालत देखकर द्रौपदी को दया आ गई और उसने अर्जुन से उसे छोड़ने की अपील की। मगर भगवान कृष्ण ने ऐसा नहीं होने दिया और उन्होंने अर्जुन को आदेश दिया कि उसके सिर से मणि निकाल ले और द्रौपदी को दे दे।
इधर, ब्रह्मास्त्र के गर्भ में जाते ही उत्तरा को तेज दर्द होने लगा। यह देख भगवान कृष्ण ने अपना छोटा रूप धारण किया और उत्तरा के गर्भ में दाखिल हो गए। कृष्ण का छोटा रूप एक अंगूठे के बराबर ही था। वे शंख, चक्र, गदा और पद्म सबकुछ धारण किए हुए थे। उत्तरा के गर्भ में अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गये ब्रह्मास्त्र की आग को शांत कर रहे थे। वहीं, गर्भ में पल रहा बालक उन्हें देखकर हैरान था कि मेरी मां के गर्भ में यह कौन घुस गया है। कुछ समय बाद उत्तरा ने अपने बच्चे को जन्म दिया लेकिन बच्चे को गर्भ से ही भगवान को देखने की आदत थ सो वह कोई भी हलचल नहीं कर रहा था
उत्तरा की बात सुनकर भगवान कृष्ण तुरंत प्रसूति गृह में प्रवेश किया और कहा प्रभु के दर्शन से ही बच्चा हलचल करने लगा और मुस्कुराने लगा तभी श्रीकृष्ण ने उसे दुसरों के इच्छा को पहचाने वाला कहते हुए उसका नाम परीक्षित रखा। वहीं, जब युधिष्ठिर वापस आए और उन्हें बालक के जन्म के बारे में पता चला तो वे भी खुशी से झूम उठे। इस खुशी में उन्होंने हाथी, छोड़े, अन्न, गाय आदि दान दिए। इसके बाद उन्होंने ज्योतिष को बुलाया और बच्चे के भविष्य की जानकारी ली। इसपर ज्योतिषी ने कहा, “यह बालक प्रभु श्रीकृष्ण चन्द्र का भक्त कहलाएगा। यह एक धर्मी, यशस्वी, पराक्रमी व दानी होगा। ”
इस तरह कलयुक के प्रवेश के पश्चात जब राजा परीक्षित को शिकार के समय कलयुक के मस्तिष्क में विराने से मति भ्रमित हुआ और ध्यान में बैठे साधु पर मृत सर्प को उसके गले में लपेटने के कारण ऋषि श्रृंगी के द्वारा उन्हे श्राप मिला कि सात दिवस के अंदर तक्षक नाग के काटने से तुम्हारी मृत्यु होगी तब मोक्ष की प्राप्ती व पश्चाताप के लिए उन्हे सलाह दी गई की व सुकदेव जी महाराज मिले तब से सुकदेव जी महाराज ने भागवत कथा का प्रथम वाचन किया और राजा परीक्षित ने कथा का श्रवण किया।
उन्होन भगवान विष्णु के वराह अवतार की कथा भी सुनाई। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु ग्रामीण उपस्थित थे।

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